Tuesday, August 7, 2007

रास्तों की मर्जी है.....

रास्तों की मर्जी है.....

बेज़मीं लोगों को ,
बेकरार आँखों को ,
बदनसीब क़दमों को ,
जिस तरफ़ भी ले जाए ,
रास्तों की मर्जी है ....

बेनिशान जज़ीरों पर ,
बदगुमान शहरों मैं,
बेज़ुबान मुसाफिर को ,
जिस तरफ़ भी भटका दें ,
रास्तों की मर्जी है ......

रोक दें या बढ़ने दें ,
थाम लें या गिरने दें ,
वतन की लकीरों को ,
तोड़ दें या मिलने दें ,
रास्तों की मर्जी है......

अजनबी कोई ला कर हमसफ़र बना दें ,
साथ चलने वालों की राख भी उडा डालें ,
यादें सारी ख़ाक मैं मिला दें ,

रास्तों की मर्जी है.........

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